देवघर में विजयादशमी पर नहीं होता रावण दहन… जानें इसके पीछे क्या है कारण

Share

शारदीय नवरात्र के विजयादशमी के दिन देशभर में राक्षस राज रावण का पुतला दहन किया जाता है। लेकिन देवघर में रावण दहण नहीं होता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ कामनालिंग बाबा वैद्यनाथ की पवित्र नगरी में नवरात्र की विजयादशमी तिथि को रावण दहन की परंपरा ही नहीं रही है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ कामनालिंग बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर को रावणेश्वर धाम कहा जाता है। देवघर में रावण को राजा के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि राक्षस राज रावण के कारण ही आज देवघर को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक कामनालिंग मिला है। अगर रावण नहीं होता तो देवघर में बाबा वैद्यनाथ की स्थापना ही नहीं हो पाती। विश्व में देवघर की अपनी अलग पहचान नहीं होती।  शास्त्रों और पुराणों में एक कहानी प्रचलित है। कठोर तपस्या के बाद लंकाधिपति रावण ने भगवान शिव से मनचाहा वर प्राप्त किया था। वर में शिवलिंग लेकर रा‍वण उसे कैलाश से लंका जाने के लिए निकला था। देवताओं ने मिलकर भगवान शिव को लंका ले जाने से रोकने का उपाय तैयार किया। उसी के तहत दैवीय प्रकोप से रावण को देवघर पहुंचने के बाद लघुशंका का एहसास हुआ और उसकी नजर गड़ेरिया का रूप धारण करने वाले देवता पर पड़ी। गड़ेरिया को रावण ने शिवलिंग सौंपते हुए उसके लौटने तक कहीं भी नहीं रखने का अनुरोध किया। इसके बाद लघुशंका के लिए चला गया। उसी बीच भगवान रूपी गड़ेरिए ने शिवलिंग को यहां देवी सती के समीप रख दिया।

बताते चलें कि देवघर में शिव व सती एक साथ विराजमान हैं। उधर लघुशंका के बाद रावण जब लौटा तो यहां पर शिवलिंग स्थापित पाया। उसके बाद रावण ने यहां से शिवलिंग ले जाने की काफी कोशिश भी की लेकिन शिवलिंग हिला नहीं। कहा जाता है कि उसके बाद ही रावण ने क्रोधवश अपने अंगुष्ठा से शिवलिंग को दबा दिया था। उसी कारण यहां शिवलिंग धंसा हुआ है। रावण के लघुशंका से बना तालाब भी यहां के हरिलाजोरी नामक स्थान पर होने की बात कही जाती है।

1 2 3 160
Facebook Comments Box