बाबा मंदिर में करीब 90 वर्षों से हो रही मां दुर्गा की पूजा… अखंड दीप जलाकर आम श्रद्धालुओं के लिए माता का पट कर दिया जाता है बंद …

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बाबा बैद्यनाथ मंदिर में करीब 90 सालों से शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की वेदी पर प्रतिमा को विराजमान कर पूजा का आयोजन किया जा रहा है़. इस पूजा की शुरुआत सरदार पंडा भवप्रितानंद ओझा ने 1931 में प्रारंभ किया था. इस पूजा को अपने आवसीय परिसर में करते थे जो की वर्तमान में अब इस परिसर में मंदिर का कार्यालय संचालित होता है़. वही कार्यालय के पीछे सरदार पंडा का आवास है़. पूजा पूरी तरह से तांत्रिक विधि से होती है़. इस मंदिर में पहले किसी आम लोगों को पूजा करने का अधिकार नहीं होता था. महालया के अवसर पर मंदिर कार्यालय में बने हवनकुंड की सफाई कर पहले पूजा के दिन से ही हवनकुंड में सरदार पंडा तांत्रिक विधि से हवन करते थे.

 जो पूरे नवरात्रा तक कनेल पुष्प से हवन कुंड में आहुति देकर हवन किया जाता है. पूरे नवरात्र तक हवन कुंड का द्वारा खुला रहता था. वर्तमान में भी परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है. वहीं माता की पूजा वर्तमान के सरदार पंडा गुलाब नंद ओझा करेंगे. वहीं सरदार पंडा को पूजा कराने के लिए आचार्य के तौर पर ईस्टेट पुरोहित  सरदार पंडा  के कुल पुरोहित श्रीनाथ पंडित पूजा की पद्धती को पढ़ेगें वहीं उपचारक भक्ति नाथ फलहारी अपने पूर्वज की परंपरा का निर्वहण करते हुए पूजा को संपन्न कराने में पूरे नवरात्र तक मंडप में मौजूद रहेंगे. यहां हर दिन रात में माता को छप्पन भोग एवं आरती के बाद पूजा को विश्राम दिया जायेगा. वहीं पंचमी के दिन नगर कुमारी बटुक भोज का आयोजन किया जायेगा. वही नवरात्रा को लेकर मंदिर प्रांगण में पंचमी के दिन से गवहर पूजा का भी आयोजन किया जाता है. जिसमें मिट्टी का कलश स्थापित कर उस पर अखंड ज्योत जलाकर पंचमी से लेकर दसवीं तिथि तक माता की आराधना की जाएगी. सप्तमी के दिन से मंदिर प्रांगण स्थित तीन देवी मंदिरों मैं अखंड दीप जलाकर माता का पट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया जाता है. दीक्षा प्राप्त श्रद्धालु ही माता का दर्शन पूजा कर सकते हैं. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है जिसका निर्वाह आज भी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ किया जाता है.

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