देश और राज्य की शान के लिए दिव्यांग ने जान लगा दी… बदले में मिला सिस्टम का तमाचा!… ऐसा मत करिए ‘हुजूर’

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ये कहानी है धनबाद के बाघमारा प्रखंड के मालकेरा 4 नंबर की। जिसने सरकारों के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहानी है उपेक्षा और मदद की आस में ठकठकी लगाए बैठे दिव्यांग लेकिन पारा एथलीट अजय कुमार पासवान की। अजय पासवान ने दिव्यांग होते हुए राष्ट्रीय पारा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में झारखंड का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रौशन किया। अजय पासवान ने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित दौड़ में कई मेडल अपने नाम किए। वो देश के लिए भी खेलना चाहते थे, लेकिन सिर्फ 5 हजार के लिए वो इससे चूक गए। घर की हालत अब ऐसी है कि वो अपना मेडल तक बेचने की नौबत हो गई है।

अजय कुमार पासवान महज 5 हजार के लिए अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं ले सके। 2015 में अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए उनका चयन हुआ था। बेलारूस में प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था। लेकिन संगठन की तरफ से कहा गया कि जो खिलाड़ी इस प्रतियोगिता में जाना चाहते हैं, उन्हें निजी खर्च पर जाना होगा। अजय ने किसी तरह अपना पासपोर्ट बना लिया, लेकिन 5 हजार नहीं जुटा पाए और उनका वीजा नहीं बन पाया। किसी ने उनकी मदद नहीं की, सिस्टम के आगे वो बेबस हो गए। वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाए और उनका सपना टूट गया। तब से लेकर अबतक उन्हें कोई मदद नहीं मिली है। घर की आर्थिक स्थिति अब इतनी खराब हो गई है कि उन्हें अपन मेडल तक बेचना पड़ रहा है।

अजय पासवान 4 बहनों के बीच इकलौटे भाई हैं। पिता यमुना पासवान घर घर पानी पहुंचाकर अपने घर का गुजारा करते हैं। खेल में बेटे की दिलचस्पी देखकर पिता ने अपने बेटे का सहयोग किया। पिता के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर तक वो खेल पाए, लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलने के बाद वो बैकफूट पर हैं। अब घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है। अब वो अपने पिता की मदद करते हैं। लेकिन अपने घर की आर्थिक तंगी नहीं दूर कर पा रहे हैं। अजय पासवान चाहते हैं कि सरकरा उनकी कुछ मदद करे।

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