Gandhi Jayanti 2021 : बापू के साथ आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले टानाभक्त के वंशज पलायन को मजबूर

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गुमला : आज गांधी जयंती के अवसर पर हम हम बात कर रहे हैं उन टाना भगतों की जिन्होंने भारत की आजादी में बापू के साथ उनके कंधे से कंधा मिलाकर अपना पूरा योगदान किया. उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है, जिन्होंने महात्मा गांधी से मिलकर देश की आजादी में अहम भूमिका निभायी. टानाभक्तों में से एक गांधी के अनुयायी जतरा टाना भगत हैं. आज जतरा टाना भगत हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन देश की आजादी की लड़ाई में उनका योगदान अहम रहा है, परंतु झारखंड के लिए दुर्भाग्य की बात है. जिस जतरा टाना भगत ने देश के लिए जान दी. आज उनका परिवार गरीबी, तंगहाली व बेरोजगारी में जी रहा है. दो परपोते मजदूरी करने के लिए दूसरे राज्य पलायन कर गये हैं. शहीद आवास अधूरा है. खपड़ा के घर में परिवार के लोग रहते हैं. शौचालय नहीं है. खुले में शौच करने जाते हैं.

जतरा टाना भगत के पोता विश्वा टाना भगत ने बताया कि मेरे चार पुत्र हैं. गांव में रोजगार नहीं है. सुरेश टाना भगत तमिलनाडु व रमेश टाना भगत बेंगलुरु में मजदूरी करता है. अन्य दो बेटा शिवचंद्र और मंत्री टाना भगत गांव में ही रह कर दूसरों के यहां धांगर का काम करते हैं. विश्वा की पत्नी बुधमनिया टाना भगत की उम्र 65 वर्ष है, परंतु उसे पेंशन नहीं मिलती है. बुधमनिया ने बताया कि आधार कार्ड बनाने वालों ने मेरी उम्र कम कर दी. जिसके कारण मुझे पेंशन नहीं मिल रही है. आधार कार्ड सुधार के लिए भी कई बार प्रयास किये, परंतु सुधार नहीं हुआ.

जतरा टाना भगत का जन्म 1888 ईस्वी में हुआ था. 12 दिसंबर 1912 को जमींदारी प्रथा, अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ आवाज उठायी. 1914 ईस्वी में रामगढ़ में महात्मा गांधी से जतरा टाना भगत मिले थे. 1915 ईस्वी में अंग्रेजों ने जतरा टाना भगत को गिरफ्तार कर लिया था. छह माह तक वे जेल में रहे. जेल में उन्हें यातनाएं दी गयी थीं. 1916 में वे जेल से छूटे, परंतु दो महीने के बाद उनका निधन हो गया. शव को गुमला शहर के जशपुर रोड स्थित काली मंदिर के समीप से बहने वाली नदी के किनारे दफनाया गया था. इसी नदी के किनारे जतरा टाना भगत के वंशज व अनुयायी लंबे समय से समाधि स्थल बनाने की मांग कर रहे हैं, परंतु नहीं बनी. अंग्रेजों से हुए जतरा टाना भगत की युद्ध की कहानी शिलापट्ट में अंकित करने की भी मांग की जा रही है.

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