जमशेदपुर में होती है अनोखे तरीके से मां की पूजा… गुड्डे-गुड़ियों के रूप में की जाती है आराधना…

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जमशेदपुर में मां की पूजा अनोखे अंदाज में की जाती है। इस पूजा को जमशेदपुर में दक्षिण भारतीय लोग काफी अर्से से करते आ रहे हैं। इस पूजा को तेलगू में वमलाकोलुयु कहा जाता है। जबकि हिंदी में गुड़िया पूजा कहा जाता है। कलश स्थापना के दिन से शुरू होने वाली यह पूजा पूरे नौ दिन तक चलती है। इस पूजा को घरों की औरतें करती हैं।

दक्षिण भारत में बेटियों का काफी सम्मान किया जाता है। वहां पर बेटियों को मां संज्ञा दी जाती है। बेटियां जब विवाह के बाद अपने ससुराल चली जाती हैं तो घऱ सुना हो जाता है। इसलिए मां की आराधना इसी प्रकार की जाती हैं। ताकि बेटियों को याद कर सकें। यही नहीं, पूजा के दिन ससुराल से बेटियां भी अपने मायके आ जाती हैं। पूजा के पहले घर की माहिलाएं सीढ़ीनुमा मंच तैयार करती हैं। इस सीढ़ी में जोड़ा का ख्याल रखा जाता है। 5, 7, 9, 11 इस तरह का सीढ़ी रैक बनाकर तैयार किया जाता है। चूंकि इनके यहां भागवान शिव को मुख्य भगवान माना जाता है तो सबसे ऊपर उन्हें बैठाया जाता है। उसके बाद जिस भागवान को जो परिवार है, उस परिवार के साथ सबको रखा जाता है। सभी छोटे छोटे आकार के रखे जाते हैं। यही नहीं, जहां पर देवी -देवाताओं को रखा जाता है, उसे काफी बढ़िया तरीके से सजाया जाता हैं। उसके बाद चारों ओर लाइट लगाई जाती है। इस दौरान छोटे छोटे खिलौनों को भी रखा जाता है। इसके बाद सभी देवी-देवाताओं की बारी बारी से पूजा करती हैं। इस दौरान जो भी दीपक जलाए जाते है, वो पूरे नौ दिनों तक जलते रहते हैं। मां की पूजा करने के बाद मां ललीता देवी और मां दुर्गा का पाठ किया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद महिलाएं एक दूसरे के माथे पर कुमकुम और गले पर चंदन टीका लगाती हैं। इसके बाद माहिलाओं की ओर से प्रसाद भी बांटा जाता हैं। पूरे नौ दिनों तक पूजा का आयोजन होता है।

इस पूजा में जितने भी छोटी आकार के देवी देवाताओं को यहां रखा जाता है, उसका विसर्जन नहीं होता है। विजय दशमी के दिन उनमें से किसी एक देवी या देवता को भजन या लॉरी गाकर सुला दिया जाता है। उसके बाद पूजा में रखे सभी देवी-देवाताओं को बढ़िया से पैक करके रख दिया जाता है। ताकि अगले साल फिर इन देवी देवाताओं का उपयोग कर सकें। इस पूजा का मुख्य उद्देश्य बेटी को सम्मान देना है, इसलिए इसकी तैयारियां खास तरह की होती हैं। इसमें शक्ति के नौ अलग-अलग अवतार की पूजा की जाती है। जिसमें विष्णु दशावतार, अष्टलक्ष्मी अवतार, विद्या अवतार शामिल हैं। सीढ़ियों में पौराणिक कथाओं के आधार पर गुड़िया को सजाया जाता है। सबसे ऊपर आदि शक्ति शिव –पार्वती को रखा जाता है क्योंकि वह सबके पालन हार हैं।

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