कोडरमा के DC रमेश घोलप ने बताया कोरोना काल का सच!… गुलजार की कविता सुनाई

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कोडरमा के उपायुक्त रमेश घोलप के संघर्ष की कहानी तो आपने सुनी ही होगी। कैसे मजदूरी और चूड़ी बेचकर उनकी मां ने पढ़ाया। कई इंटरव्यू में रमेश घोलप अपने संघर्ष की कहानी लोगों को बता चुके हैं। कैसे गाय के मिले लोन के पैसे से उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी की। रमेश घोलप हमेशा से कई छात्रों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी वो सक्रिय रहते हैं। अब उन्होंने कोरोना काल में लोगों के जीवन को गीतकार गुलजार के शब्दों में बयां किया है। रमेश घोलप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंटर ट्वीटर में जो लिखा है वो एक दम कोरोना की सच्ची कहानी प्रतीत होती है। रमेश घोलप ने गुलजार की कविता को ट्वीटर पर कुछ इस तरह लिखा है-

एक मुद्दत से आरजू थी फुरसत की।। मिली इस शर्त पर कि किसी को न मिले।। कैसा समय आया, दूरियां ही दवा बन गई।। जिंदगी में पहली बार ऐसा वक़्त आया।। इंसान ने जिंदा रहने के लिए कमाना छोड़ दिया ।। घर गुलजार, सूने शहर।। बस्ती-बस्ती में कैद हर हस्ती हो गयी।। आज फ़िर ज़िंदगी महंगी और दौलत सस्ती हो गयी।।

रमेश घोलप
गुलाजर की कविता

रमेश घोलप के जीवन परिचय पर एक नजर

IAS रमेश घोलप मूलत महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के रहने वाले हैं। झारखंड में सचिव स्तर के पद से लेकर वो झारखंड के कई जिलों के उपायुक्त भी रह चुके हैं। रमेश घोलप की गरीबी और संघर्ष की कहानी कुछ ऐसी है कि उनकी मां मजदूरी करती थीं। जब उनकी मां चूड़ियां बेचने जाया करती थीं वो उनके साथ जाते थे। पिता की साइकिल की दुकान थी, लेकिन उनके पिता की शराब की आदत की वजह से दुकान भी बंद हो गई। मां ने एक बार गाय खरीदने के लिए कर्ज लिया था। इन कर्ज के पैसों से मां ने अपने बेटे को सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी करवाई। आज जब वो IAS हैं तब भी उनकी मां चूड़ी बेचती हैं। उनकी मां कहती हैं कि संघर्ष में जिसने साथ दिया, उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।

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