इस मंदिर में नौ नहीं 16 दिन का होता है नवरात्र… पान गिरे बिना मां का विर्सजन संभव नहीं

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लातेहार के रांची-चतरा मुख्य मार्ग पर हजारों साल पुराना मां उग्रतारा नगर मंदिर है और शक्तिपीठ के तौर पर मशहूर इस मंदिर में 16 दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है। जितिया के दूसरे दिन से उग्रतारा मंदिर में दुर्गा पूजा शुरू हो जाती है। वहीं नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना कर अष्टभुजी माता की पूजा अर्चना आरंभ की जाती है। इस मंदिर में पूजा अर्चना के लिए झारखंड के विभिन्न हिस्सों के साथ ही पड़ोसी राज्य बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ समेत कई अन्य राज्यों से श्रद्धालु यहां आते रहते है।

16 दिवसीय पूजन के बाद विजयादशमी के दिन मां भगवती को पान चढ़ाया जाता है। आसन से पान गिरने के बाद यह समझा जाता है कि मां भगवती की ओर से विसर्जन की अनुमति मिल गयी है, तब विसर्जन होता है। इस दौरान हर दो-दो मिनट पर आरती की जाती है। कभी-कभी तो पूरी रात पान नहीं गिरता और आरती का दौर निरंतर जारी रहता है। पान गिरने के बाद विसर्जन की पूजा होती है।

स्थानीय लोग बताते है कि राजा आखेट के लिए लातेहार के मनकेरी जंगल में गये थे। जहां तोड़ा तालाब में पानी पीने के दौरान देवियों की मूर्तियां राजा के हाथ में आ जा रही थीं। लेकिन राजा ने मूर्तियों को तालाब में डाल दिया। तभी भगवती ने रात में राजा को स्वप्न दिया और मूर्तियां को महल में लाने को कहा। इसके बाद तालाब से मूर्तियों को लेकर राजा अपने महल में पहुंचे और आंगन में मंदिर का निर्माण कराया। जिस प्रकार एक राज दरबार में व्यवस्था होती है, वैसी ही व्यवस्था तत्कालीन राजा ने मंदिर के लिए बनायी थी। यह आज भी कायम है।

मंदिर में हर कार्य के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति की गयी थी। इसके लिए राजा ने सभी को जमीन दान में दिया था। इसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी कर्मचारी मंदिर के कार्यों के निर्वहन में जुटे हैं। रहस्य और प्राचीनता की चादर ओढ़े इस मंदिर में एक और अनोखी बात है कि यहां 365 दिन मां भगवती को चावल दाल का भोग लगाया जाता है। एक तय मात्रा में बनने वाला भोग मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को प्राप्त होता है। इसके लिए दोपहर में मां भगवती को पूजारी उठाकर रसोई में ले जाते हैं। यहां भोग लगने के बाद भगवती को वापस मंदिर में आसान पर ग्रहण कराया जाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रसिद्ध वीर मराठा रानी अहिल्याबाई भी मां उग्रतारा मंदिर में पूजा अर्चना करने आयी थी। कहा जाता है कि बंगाल यात्रा के दौरान में रानी का आगमन इस क्षेत्र में हुआ था।

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