मोक्षिनी एकादशी दिलाती है पापों से मुक्ति… जानिए महत्‍व, व्रतकथा और पूजाविधि…

Share

चैत्र महीने के कृष्णपक्ष की पाप मोक्षिनी एकादशी 7 अप्रैल को रहेगी। यह एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से विशेष फल मिलना होता है। इस दिन लोग व्रत के साथ भगवान सत्यनारायण की कथा और विष्णु सहस्त्रनाम पाठ भी करते हैं। इस व्रत को करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव को दूर किया जा सकता है और इसके साथ ही मन के बुरे विचार भी नष्‍ट हो जाते हैं। पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने वाले जातकों का चंद्रमा भी शुभ फल देता है। साथ ही इस दिन अन्न और जल दान करने से कई गुना पुण्य मिलता है।

मोक्षिनी एकादशी की पूजाविधि

माना जा रहा है कि एकादशी तिथि 7 अप्रैल को सूर्योदय से शुरू होकर पूरे दिन रहेगी। इसलिए इसी दिन (बुधवार) व्रत और पूजा करनी चाहिए। इस दिन सुबह उठकर नहाने के बाद साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन पीले कपड़े पहनना फलदायी माना जाता है क्योंकि भगवान विष्णु को पीला रंग पसंद उसके बाद लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्‍णु की मूर्ति को स्‍थापित करें। फिर दाएं हाथ में चंदन और फूल लेकर एकादशी का व्रत करने का संकल्‍प करें। उसके बाद भगवान को पीले फल, पीले फूल और पीली मिष्‍ठान का भोग लगाएं। उसके बाद यदि आप सक्षम हों तो विष्‍णु सहस्‍त्रनाम का पाठ करें और भगवान को जनेऊ अर्पित करें।

पूजा का मुहूर्त

एकादशी का आरंभ : 7 अप्रैल, सुबह 2 बजकर 9 मिनट से

एकादशी तिथि का समापन : 8 अप्रैल, सुबह 2 बजकर 28 मिनट तक

व्रत पारण करने का मुहूर्त : 8 अप्रैल को दोपहर 1 बजकर 39 मिनट से 4 बजकर 11 मिनट तक

मोक्षिनी एकादशी व्रतकथा

पौराणिक कथा के माने तो भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजा मान्धाता ने एक समय लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने-अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा को जवाब देते हुए ऋषि ने कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नाम के वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। इस वन में एक दिन मंजुघोषा नाम की अप्सरा की नजर ऋषि पर पड़ी तो वो उन पर मोहित हो गई और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगी। जिससे ऋषि की तपस्या भंग हो गई। इससे गुस्सा होकर उन्होंने अप्सरा को पिशाचिनी बनने का श्राप दे दिया। अप्सरा दुःखी होकर वह ऋषि से माफी मांगने लगी और श्राप से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने लगी। ऋषि ने उसे विधि सहित चैत्र कृष्णपक्ष एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। इस व्रत से अप्सरा पिशाच योनि से मुक्त हो गई। पाप से मुक्त होने के बाद अप्सरा को सुन्दर रूप मिला और वो स्वर्ग चली गई।

50 हजार से अधिक सम्मानित पाठकों के साथ झारखंड जंक्शन झारखंड का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला ऑनलाइन न्यूज पोर्टल है।

विज्ञापन के लिए संपर्क करें- 7042419765

Facebook/Jharkhand Junction