पलामू के इन दो गांवों में कलम के जगह लड़कियों ने उठाया हथियार,

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पलामू में जिनके हाथों में कलम होना चाहिए था उन हाथों ने हथियार उठा लिए है। गुड़ियों से खेलने की उम्र में गोलियों से खेल रही है। आज से तीन साल पहले पलामू के पाल्हे और तुरकुन इन दो गांवों की लड़कियां लकड़ी चुनने निकली थी, जिनमें से कुछ लड़कियां नक्सली बन गईं। कुछ लड़कियों के शव घर लौटे और कुछ सलाखों के पीछे नजर आईं।

मेदिनीनगर से करीब 70 किलोमीटर दूर पाल्हे और तुरकुन गांव है। जो अचानक फरवरी 2018 में पाल्हे और तुरकुन गांव चर्चा में आ गए। दोनों गांव नौडीहा बाजार थाना क्षेत्र में है और पहाड़ियों से घिरा हुआ है। फरवरी 2018 में एंटी नक्सल अभियान के दौरान सुरक्षाबलों की माओवादी के साथ दो बार मुठभेड़ हुई थी। इसी मुठभेड़ में दो महिला नक्सली मारी गई थी, जबकि चार गिरफ्तार हुई थी। सभी महिला नक्सली पाल्हे और तुरकुन गांव की थीं। गांव की आज भी एक महिला नक्सली जेल में है, जबकि दो गांव में रह रही हैं। वहीं एक महिला नक्सली के भाई ने बताया कि उनकी बहन नक्सली दस्ते से वापस घर आ गई थी। पर नक्सली दस्ता उन पर दबाव बनाकर बहन को फिर से दस्ते में शामिल कर लिया। इस दौरान वो डर से कुछ बोल भी नहीं पाए। वहीं एक महिला ने बताया कि उसकी बेटी लौट चुकी थी, वो दस्ते में शामिल नहीं होना चाहती थी। उसने उन्हें बताया था कि काफी पैदल चलना पड़ता है और वजन भी उठाना पड़ता है। बता दें पाल्हे और तुरकुन गांव में करीब 50 से 55 घर हैं। इन दोनों गांव में सरकारी व्यवस्था के नाम पर स्कूल के अलावा एक सरकारी योजना का बोर्ड भी नजर नहीं आएगा। यहां तक की इन दोनों गांव में साइकिल भी नहीं जा सकता। पुलिस को छोड़कर इन दोनों गांवों में कोई भी सरकारी तंत्र नहीं पंहुच सकता है।

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