कोरोना काल में हो रही मौत को व्यवस्था रचित हत्याएं क्यों कहा जा रहा है?

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रांची के एक जाने माने पत्रकार सोहन सिंह ने कोरोना काल में हो रही मौतों को व्यवस्था रचित हत्याएं करार दिया है। उन्होंने कहा कि ये कड़वा है लेकिन यही सच है। आगे वो कहते हैं कि लोगों का रोना उनका दर्द सरकार को सुनाई नहीं दे रहा है। लोग बिलख-बिलख कर रो रहे हैं, बेमौत मर रहे हैं लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

झारखंड में कोरोना मरीजों को ना बेड मिल रहा है, ना वेंटिलेटर। मरीज और उनके परिजन इलाज के लिए परेशान होकर दर दर भटक रहे हैं। जो वेंटिलेटर सरकार के पास उपलब्ध हैं उनकी कोई सुध लेना वाल भी नहीं है।

रांची के रिम्स में एक ही बेड पर दो दो मरीजों का इलाज हो रहा है, जबकि कोरोना तो संपर्क में आने से ही फैलता है।

रांची के सबसे बड़े रिम्स अस्पताल में 72 साल के बुजुर्ग को इलाज के लिए बेड नहीं मिलने के बाद जमीन पर लेटना पड़ता है।

रांची के प्राइवेट अस्पताल आपदा को अवसर बनाने में जुटे हैं। मरीजों से मनमाना पैसा वसूला जा रहा है।

रांची के द्वारिका अस्पताल में कोरोना के इलाज में एक मरीज को एक लाख रुपए का बिल थमा दिया जाता है।

एक व्यक्ति को गंभीर रूप से कोरोना से बीमार पिता की मदद के लिए ट्वीटर पर गुहार लगानी पड़ती है। क्या अब लोगों का इलाज ट्विटर के माध्यम से होगा।

रांची सिविल सर्जन कोरोना संक्रमित होने के बाद अपना इलाज सरकारी अस्पताल की बजाए प्राइवेट अस्पताल में करवाते हैं।

रांची की सड़क पर कोई बेहोश पड़ा नजर आता है, लेकिन कोरोना के डर से लोग मदद तक के लिए नहीं आते।

कोरोना से मरने वाले व्यक्तियों के शवों के साथ अमानवीय व्यवहार की तस्वीरें आती हैं। परिजनों के नहीं आने पर एंबुलेंस शव को श्मशान घाट पर ही फेंक कर चले जाते हैं।

रांची में अंतिम संस्कार के लिए भी लाइन लगाने पड़ती है। शवों को जलाने के लिए लकड़ियां खत्म हो जा रही है। हरमू मुक्तिधाम के गेट पर ताला लगाना पड़ाता है क्योंकि यहां की मनीशें खराब हो जाती हैं।

सोहन सिंह ने दावा किया कि रांची के रेल कोच में 270 बेड का आइसोलेशन वार्ड है। ये आइसोलेशन कोच जंग खा रहा है, लेकिन झारखंड सरकार इसे इस्तेमाल ही नहीं कर रही है। उन्होंने दावा किया कि अगर स्वास्थ्य विभाग इसका इस्तेमाल करती तो नए बेड की जरूरत ही नहीं पड़े। इन आइसोलेशन बेड में ऑक्सीनज सप्लाई की व्यवास्था है।