लाल आतंक का फरमान… स्कूल के बच्चों पर पड़ रहा बुरा प्रभाव…

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पलामू से करीब 70 किलोमीटर दूर तीन गांव पाल्हे, तुरकुन और गोरहो है। इस गांव में नक्सलियों का असर तो कम है लेकिन स्कूल के दिवारों पर जो भी फरमान लिखा होता है उसे लोग अब तक मान रहे हैं। फरमान में लिखा है

“कच्चा लकड़ी काटा तो 500 रुपए जुर्माना और 20 डंडे पिटाई, साइकिल से लकड़ी लाने पर हजार रुपए जुर्माना और 25 डंडे पिटाई, स्टॉक लकड़ी रखे जाने पर 5 लाख रुपए जुर्माना”

बच्चों के सवाल

बच्चे पूछते हैं-किसने लिखा था फरमान। वहीं एक पत्रकार ने बताया कि एक वक्त था कि जब इन फरमानों का प्रभाव होता था। लोग इन बातों को मानते थे। अब वक्त और हालात बदल गए हैं। लेकिन, इससे बच्चों की सोच पर काफी प्रभाव पड़ता है। बच्चे लोगों से पूछते हैं कि वे कौन थे जो इस तरह का फरमान लिखते थे. इसके पीछे क्या कारण था। नक्सली बनने की राह पर बच्चे बताया जा रहा है कि जहां यह फरमान लिखा है उस इलाके से 6 बच्चे नक्सली दस्ते में शामिल हो गए थे। मुठभेड़ में दो लड़कियां मारी गईं थीं। एक अब भी जेल में है और तीन अब सामान्य जीवन जी रही है। ग्रामीण बताते हैं कि माओवादी गांव की लड़कियों को लेकर चले गए थे। उनकी हिम्मत नहीं थी कि सभी को दस्ते से वापस ले आएं। एक पूर्व महिला नक्सली के भाई ने बताया कि वह बाहर था और लौटा तो पता चला कि उसकी बहन दस्ते में शामिल हो गई है।

जाने का कोई रास्ता नहीं

आप को बता दें कि पाल्हे, तुरकुन और गोरहो चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा है। इन गांव में लोग सिर्फ पैदल ही जा सकते हैं। सिर्फ एक पगडंडी है जिसके सहारे गांव तक पहुंच सकते हैं। 80 से 90 घरों की आबादी वाले तीनों गांव में सरकारी स्कूल के भवनों को छोड़ दिया जाए तो कोई भी सरकारी योजना का बोर्ड नजर नहीं आता है। 2009 से 2013 के बीच माओवादियों ने पलामू में दो दर्जन के करीब स्कूल भवनों को विस्फोट कर उड़ा दिया था।