95 साल पुराने फुटबॉल क्लब की कहानी… खिलाड़ियों की दीवानगी देख अंग्रेज भी मानते थे इनका लोहा

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दुनिया में फुटबॉल सबसे ज्यादा खेला जाता है. इस खेल के साथ एक शब्द और जुड़ा है वह है क्लब. आज हम झारखंड के सबसे पुराने फुटबॉल क्लब का इतिहास आपसे साझा करने जा रहे हैं. झारखंड में फुटबॉल का इतिहास काफी पुराना है. 87 साल के एक बुजुर्ग केसी रवि का, जो शायद आज की तारीख में झारखंड के फुटबॉल के इतिहास  के सबसे पुराने हस्ताक्षर के रूप में मौजूद हैं.

1935 में जन्मे फुटबॉलर केसी रवि ने बताया कि 1900 के शुरुआती दशक में ग्रामीण और शहरी इलाकों में जिस खेल ने लोगों को अपना दीवाना बनाया उसमें फुटबॉल सबसे आगे था. ग्रामीण इलाकों में हॉकी के साथ साथ तब फुटबॉल भी खूब खेला जाता था. लेकिन शहरों में अंग्रेजों की मौजूदगी में फुटबॉल तेजी से पनप रहा था. इसी बीच 1927 में झारखंड में सबसे पहले रांची फुटबॉल क्लब  को जमीन पर उतारा गया. उस समय फुटबॉल को करीब से महसूस करने वाले लोगों की कमी नहीं थी, जिसमें एक कांतू बाबू भी थे. जिन्होंने रांची फुटबॉल क्लब की नींव रखी. उनके साथ रामचंद्र प्रसाद उर्फ नथुनी मुंशी और अखिलेश प्रसाद सिन्हा ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई. बताया जाता है कि फुटबॉल के दीवाने तेजी से इस क्लब से जुड़ते गये. 1947 में जूनियर स्तर से खेलने के बाद केसी रवि भी इस क्लब से जुड़ गये. कांतू बाबू ने ही उस दौर में मुंद्रिका कप की शुरुआत की थी जिसकी ट्रॉफी आज भी केसी रवि के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रही है. केसी रवि बताते हैं कि करीब 95 साल पहले यानि 1927 में जब रांची फुटबॉल क्लब अस्तित्व में आया. तब रांची के कचहरी के पास बिहार क्लब में उसका ऑफिस हुआ करता था. हालांकि आज बिहार क्लब में रांची फुटबॉल क्लब का न तो कोई बोर्ड नजर आता है और न ही नामोनिशान. लेकिन अंग्रेजों के जमाने की यह बिल्डिंग आज भी फुटबॉल की उस दीवानगी की गवाह है.

केसी रवि को 1947 की रांची याद है जब रांची में कचहरी के पास ही वर्तमान जयपाल सिंह स्टेडियम और टाउन हॉल के पास अब्दुल बारी मैदान और फुटबॉल का एक बड़ा मैदान हुआ करता था. तब उस समय रांची फुटबॉल क्लब के बाद कुछ और नये क्लब बने, जिसमें स्पोर्टी यूनियन क्लब, बंगाली समाज का यूनियन क्लब, आदिवासियों का छोटानागपुर ब्लूज और मुस्लिम समाज का वाईएमसी क्लब था. इन सभी क्लबों में कई दिग्गजों की मौजूदगी फुटबॉल के रोमांच के चरम पर कुछ यूं बढ़ा देती थी, जिनमें रंजीत रूद्रा, मोती पहलवान, आर. लाल और भरत बाबू जैसे फुटबॉलर का जलवा था. इनका खेल देखने के लिए 30 से 40 हजार दर्शकों की भीड़ उमड़ती थी. हाल ये था कि उस समय मैच देखने के लिए एक आना से चार आना तक का टिकट लगता था और पूरे मैदान को टीने के चदरे से घेर दिया जाता था. ताकि कोई बिना पैसे चुकाए मैच न देख सके. बकायदा तीन चार घुड़सवार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मैदान के चारों तरफ मैच के दौरान घूमते रहते थे. हालांकि समय के साथ-साथ रांची फुटबॉल क्लब से हर दशक में खिलाड़ी जुड़ते रहे और उन्हें उनकी मंजिल भी मिलती गयी. आज इस क्लब से खेल चुके कई फुटबॉलर रांची एजी ऑफिस में नौकरी कर रहे हैं. बातचीत के दौरान खिलाड़ी अपने दौर को याद करते हैं. लेकिन जो इस क्लब से नहीं जुड़ सके. उन्हें आज भी इसका मलाल है. पांच साल बाद अपना शतक पूरा करने जा रहे रांची फुटबॉल क्लब की जिम्मेदारी आज जेपी गुप्ता के हाथों में हैं. लेकिन, इस क्लब का इतिहास ऐसा है कि आज भी खिलाड़ी इससे जुड़कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं.

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