डूबते को तिनके की सहारे की तरह झारखंड के मासूम युवा छात्रों की भावनाओं का फायदा उठाकर, एक झूठा सपना बेचकर फिर से बचे उनके करियर पर भी दांव लगाने की तैयारी है।
लाखों छात्रों की भावनाओं से खेलने की तैयारी की जा रही है। तोता अब पिंजड़े से आजाद होना चाहता है, इसलिए लगभग 3 महीने के बाद JSSC CGL का जिन्न फिर से बाहर निकाला गया है।
कुछ शिक्षक के वीडियो के माध्यम से छात्रों को विश्वास दिलाया जा रहा है कि अभी भी JSSC CGL की लड़ाई बाकी है। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि हाई कोर्ट में “कोर टीम” की गलती से हार नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट में में तो अभी केस रिजेक्ट भी नहीं हुआ है।
बोला जा रहा है कि अब लड़ाई फिर से शुरू होगी, चंद कुछ लोग इस लड़ाई का नेतृत्व करेंगे। छात्र फिर से तैयार रहें, जब बोला जाए चंदे के माध्यम से आर्थिक सहयोग करें।
6 महीने बाद क्या होने वाला है?
एक लाइन में बोलें तो कुछ नहीं होने वाला है! बोला तो जा रहा है कि CID का जांच रिपोर्ट आने दीजिए, फिर देखिए क्या होता है। खुद सोचने और समझने की जरूरत है कि CID ने या तो सही जांच किया होगा या गलत?
अगर CID ने सही जांच किया तो अभी तक जो कुछ भी परिणाम सामने दिख रहा, सब सही है। अगर गलत जांच किया या फिर सरकार के प्रभाव में जांच हुआ तो फिर 6 महीने बाद ऐसा क्या होने वाला है जो CID सही जांच कर देगी। अगले 6 महीने में ऊपर से लेकर नीचे तक सरकार और सिस्टम तो वही रहने वाला है।
अगर CID ने पहले गलत जांच किया, वो भी तब जब निगरानी हाईकोर्ट कर रहा था, तो अब तो ऊपर में हाईकोर्ट भी नहीं बैठा। अब तो जो मन होगा वो करेंगे!
इसलिए 6 महीने बाद जांच में कुछ नहीं आने वाला, कुछ नहीं बदलने वाला है। बस झूठी उम्मीद देने की कोशिश की जा रही है, लेकिन क्यों? पढ़िए आगे पता चल जाएगा!
JSSC CGL केस को लेकर हाईकोर्ट में नहीं हुई कोई गलती?
पिछले दिनों अलग-अलग वीडियो के माध्यम से जैसा जानकारी सामने से देने का प्रयास किया गया कि जो कोर टीम हाईकोर्ट में लड़ाई लड़ रही थी, वे लोग कॉम्प्रोमाइज नहीं थे। हां, लेकिन उनसे कुछ गलती जरूर हुई है।
बताया गया की अंतिम कुछ तारीख में सुनवाई के दौरान एफिडेविट नहीं दिया गया क्योंकि हाई कोर्ट ने एफिडेविट लेने से मना किया था, उसके स्थान पर मेमो दिया गया था।
लेकिन सवाल है कि जिस सबूत के ऊपर बैठकर चंदा इकट्ठा किया जा रहा था कि अभी तो असली खेल होना बाकी है, उन सभी चीजों को अंतिम समय के लिए क्यों बचा कर रखा गया? वो भी तब, जब लगातार एहसास हो रहा था कि अब केस दूसरे दिशा में जा रहा है?
अगर कोर्ट में एफिडेविट दिया जाता है तो जजमेंट में कोर्ट उस एफिडेविट में दिए गए तर्कों का या तो समर्थन करती है या फिर खंडन करती है। कहने का मतलब है कि जजमेंट में एफिडेविट में दिए गए सबूत का जिक्र जरूर रहता है।
आप हाई कोर्ट का अंतिम आदेश पढ़ लीजिए, उसमें आपको उन किसी भी बातों का जिक्र नहीं मिलेगा जो हाईकोर्ट में अंतिम तीन से चार तारीख को पर सुनवाई के दौरान बोला गया और बाहर में ढिंढोरा पीटा गया कि देखिए अब तो हम लोग केस आसानी से जीत रहे हैं। तो मौखिक बोलने का क्या फायदा!
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ सबने वीडियो के जरिए देखा। एक भी जरूरी मुद्दे नहीं रखे गए जो पूरे केस का आधार था। 10 मिनट भी ढंग से सुनवाई नहीं हुई और सुप्रीम कोर्ट ने साफ बोला कि हाईकोर्ट का फैसला सही है।
कुछ गलती की कोई माफी नहीं होती है। क्या यह संभव है कि गलती को माफ कर देने से 3 लाख झारखंड के युवाओं का करियर खराब होने से बच जाएगा? क्या उनका 10 साल का सपना फिर से वापस पूरा हो पाएगा?
जो लोग सामने से लड़ रहे थे उनको अत्यंत परेशानी और तकलीफ हुई, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन वह परेशानी कुछ समय के लिए है लेकिन उनकी गलती के कारण जो छात्रों का जीवन खराब हुआ है उसकी अब भरपाई किसी भी रास्ते से संभव नहीं है।
करोड़ों के चंदा, चंदे का हिसाब और विवाद
सितंबर 2024 से लेकर जनवरी 2026 तक आंदोलन, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई को लेकर लाखों रुपए जमा हुए। कहां खर्च हुआ, कैसे खर्च हुआ, कब खर्च हुआ इसका पता सिर्फ कुछ गिने-चुने लोगों को ही है।
जब लाखों छात्रों के प्रयास से, ऑनलाइन कैंपेन से इतना पैसा जमा हुआ तो एक-एक पैसे का हिसाब उन छात्रों को जानने का हक है।
लेकिन अब बोल जा रहा है कि जिसको हिसाब चाहिए आप पर्सनली संपर्क कीजिए आपको हिसाब दिया जाएगा, वह भी यह जानने के बाद आपने कितना चंदा दिया था।
चंदा और चंदे के हिसाब पर किसी एक व्यक्ति या किसी एक टीम का हक नहीं बल्कि तीन लाख छात्रों का हक है। बैंक स्टेटमेंट के माध्यम से पब्लिक प्लेटफॉर्म पर चंदे का हिसाब जारी होना चाहिए।
जिन लोगों ने युवाओं के सपनों को रौंदकर अपना करियर बनाया है, उन्हें छात्रों के बीच में दुबारा जाने के लिए कोई तो एक बहाना चाहिए न? क्योंकि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ उसके बाद छात्रों के अंदर भयानक गुस्सा है, वर्तमान माहौल में छात्रों को फेस करना आसान नहीं है, तो उसके लिए जरूरी है कि एक झूठा दिलासा दिया जाए। उनको एक उम्मीद दी जाए कि अभी भी बहुत कुछ हो सकता है और वह उम्मीद सिर्फ मेरे माध्यम से ही पूरी हो सकती है।
तो वही बहाना, वही उम्मीद दी जा रही है कि एक बार आप लोग ईमानदारी से फिर से मेरा साथ दीजिए, आर्थिक सहयोग कीजिए। अभी भी JSSC CGL परीक्षा रद्द होगी, जिनका नौकरी हो गया है उनका नौकरी जाएगा। परीक्षा फिर से होगी और आप सचिवालय में अधिकारी बनेंगे।
JSSC CGL में आगे क्या होगा?
कुछ नहीं होगा! जी हां सच्चाई यही है।
अगर CID ने गलत जांच किया और सरकार ने छात्रों का साथ नहीं दिया। उसके बाद भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से सरकार की जीत हुई, 2000 छात्रों को नौकरी मिली और अब उनको तीसरे महीने का सैलरी मिलने वाला है।
अगर सब पहले बिके हुए थे तो अचानक तीन महीने में कैसे ईमानदार हो जाएंगे? पहले आपके पक्ष में फैसला नहीं दिया तो अब कैसे दे देंगे?
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कहने पर नौकरी मिला है, तो अब कोर्ट उनको क्यों हटाएगा? भारत में वैसे भी सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद उसको हटाना लगभग असंभव है।
वैसे सभी लोग स्वतंत्र हैं कोर्ट जाने के लिए, चंदे के माध्यम से आर्थिक सहयोग के लिए। जिसे जो अच्छा लगे वो करे।
लेकिन छात्रों को आंख बंद करके पीछे चलने से बचना चाहिए, आंख खोलकर सच्चाई देखना चाहिए और बेहतर भविष्य के लिए उसे स्वीकार भी करना चाहिए।
जय हिंद, जय झारखंड

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